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प्राणी की जीवन की यात्रा जन्म से प्रारम्भ हो जाती है। उसकी मंजिल निर्धारित होती है। यहाँ इस पवित्रा पुस्तक में मानव जीवन की यात्रा के मार्ग पर विस्तारपूर्वक वर्णन है। मानव (स्त्रा/पुरूष) की मंजिल मोक्ष प्राप्ति है।  उसके मार्ग में पाप तथा पुण्य कर्मों के गढ्ढ़े तथा काँटे हैं। आप जी को आश्चर्य होगा कि पाप कर्म तो बाधक होते हैं, पुण्य तो सुखदाई होते हैं। इनको गढ्ढे़ कहना उचित नहीं। इसका संक्षिप्त वर्णन :- पाप रूपी गढ्ढ़े व काँटे :- मानव जीवन परमात्मा की शास्त्राविधि अनुसार साधना करके मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्राप्त होता है। पाप कर्म का कष्ट भक्ति में बाधा करता है। उदाहरण के लिए पाप कर्म के कारण शरीर में रोग हो जाना, पशु धन में तथा फसल में हानि हो जाना। ऋण की वृद्धि करता है। ऋणी व्यक्ति दिन-रात चिंतित रहता है। वह भक्ति नहीं कर पाता। पूर्ण सतगुरू से दीक्षा लेने के पश्चात् परमेश्वर उस भक्त के उपरोक्त कष्ट समाप्त कर देता है। तब भक्त अपनी भक्ति अधिक श्रद्धा से करने लगता है। परमात्मा पर विश्वास बढ़ता है, दृढ़ होता है। परंतु भक्त को परमात्मा के प्रति समर्पित होना चाहिए। जैसे पतिव्रत...